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मॉ की गोद ही बच्चे की पहली तरबियत व दर्सगाह है – मौलाना अतीक अहमद बस्तवी

बेटियों को विरासत में शरअई हिस्सा देना यकीनी बनायें
ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अर्न्तगत तफहीमे शरीअत कांफ्रिन्स हुई
पूजा श्रीवास्तव

मजहबे इस्लाम में औरत को बहुत अहमियत, इज्जत और हुकूक दिये हैं। यह एक हकीकत है कि मॉ की गोद ही बच्चे की पहली तरबियत व दर्सगाह है। इस सिलसिले में घर के निजाम की जिम्मेदारी औरत ही पर है। इस की मुकम्मल रहनुमाई इस्लामी शरीअत ने की है। अगर इन हिदायात पर हम सब लोग अमल करने लगें तो घरों से बेसुकूनी खत्म हो जायेगी और घर जन्नत बन जायेगें। यें बातें ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अर्न्तगत तफ्हीम-ए-शरीअत कांफ्रिन्स कांफ्रिन्स की अध्यक्षता करते हुए मौलाना अतीक अहमद बस्तवी ने दारूल उलूम फरंगी महल में कही।
इस मौके पर मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने पर्सनल लॉ बोर्ड की तारीख पर रौशनी डालते हुए कहा कि यह बोर्ड 1973 में कायम हुआ जो हिन्दुस्तानी मुसलमानों का इदारा है। उसके बुनियादी मकसदों में तहफ्फुजे शरीअत और इत्तिहादेे मिल्लत हैं। उन्होने कहा कि तमाम धर्मों के मानने वालों को अपने अपने पर्सनल लॉज पर अमल करने की संवैधानिक आजादी है। इसी तरह मसुलमानों को भी यह हक व अधिकार प्राप्त है। उन्होने कहा कि इस बात की वजाहत जरूरी है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ की बुनियाद कुरान करीम व हदीस पाक है। उन्होने कहा कि इस कांफ्रेन्स का मकसद यह है कि अवाम के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ से सम्बन्धित गलत फहमियॉ दूर की जायें और यह बेदारी पैदा की जाये कि किस तरह हम अपने मामलात को कानूनी दायरे में हासिल करें।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिकवक्ता काजी सबीहुर्रहमान ने इस अवसर पर कहा कि बोर्ड की तरफ से यह एक अच्छा कदम है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के सम्बन्ध में जो गलत फहतियॉ हैं वह दूर होंगी और इससे जो केसेज अदालतों में आयेगें उनकी पैरवी करने में भी वकीलों को सहायता मिलेगी।
मौलाना मो0 उमर आबिदीन कासमी ने खुलाः शरअई नुक्ता नजर के विषय पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि इस्लामी शरीअत ने बीवियों को यह हक व अधिकार दिया है कि अगर वह शौहर के साथ उसके जुल्म व सितम या अधिकारों से वंचित रहने की वजह से रहना नही चाहतीं हैं तो वह खुला के जरिये से अपने निकाह को खत्म करा सकती हैें।
मौलाना मो0 नसरूल्लाह नदवी ने ‘‘मीरास में ख्वातीन का हिस्सा’’ के विषय पर सम्बोधन करते हुए कहा कि इस्लाम वह पहला धर्म है जिसने सबसे पहले औरतों को अपने वालिदैन, शौहर, बेटे की जायदाद में शरअई तौर पर हिस्सा दिया है। उन्होने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ने यह आदेश दिया है कि मीरास में मॉ, बहिन, बीवी, बेटी, पोती, परपोती, सौतेली बहिन, दादी और नानी को हिस्से दिये जायें। इन हिस्सों को कुरान पाक ने निर्धारित किया है।
कांफ्रिेन्स का आखिरी सम्बोधन ‘‘मुस्लिम पर्सनल लॉ की संवैधानिक हैसियत’’ हाई कोर्ट के अधिवक्ता शेख सऊद रईस ने देते हुए कहा कि भारत के संविधान की धारा 25 में इस बात की उल्लेखना की गयी है कि हर नागरिक को अपनी पसन्द का धर्म अपनाने, उसका प्रचार करने और उस पर अमल करने का अधिकार प्राप्त है। उन्होने कहा कि शरीअत अप्लीकेशन एक्ट 1937 में इस बात की उल्लेखना की गयी है कि वह केसेज जिन में दोनों पार्टी मुसलमान हों और उन मामलात का तअल्लुक निकाह, खुला, फस्ख़, तफरीक़, तलाक़, लआन, इद्दत, नफक़ा, विरासत, वसीयत, हिबा, विलायत, रिज़ाअत, हज़ानत और वक्फ से हो तो इन मामलात का निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ की रौशनी में ही किया जाये।
हैदराबाद से आये मौलाना मो0 उमर आबिदीन कासमी ने ‘‘खुलाः शरअई नुक्ता नजर’’ के विषय पर मौलाना नसरूल्लाह नदवी ‘‘मीरास में ख्वातीन का हिस्सा’’ के मौजू पर एडवोकेट शेख सऊद रईस ‘‘मुस्लिम पर्सनल लॉ की आइनी हैसियत’’ के उनवान पर मुहाजरे दिये’’ जलसे का संचालन दारूल उलूम फरंगी महल के प्रधानाचार्य मौलाना नईमुर्रहमान सिद्दीक़ी ने की और मौलाना मो असअद नदवी ने मेहमानों का शुक्रिया अदा किया। कांफ्रिन्स का आरम्भ दारूल उलूम के अध्यापक कारी कमरूद्दीन की तिलावत से हुआ। जामिआतुल मोमिनातुल इस्लामिया की छात्राओ ने नात पाक का नजराना पेश किया। कांफ्रिेन्स में उलमा, बुद्धजीवी, अधिवक्ता, छात्र व छात्रायें और औरतों ने बड़ी संख्या में शिरकत की।

 

 

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