“बिना संस्कार नही सहकार,
बिना सहकार नहीं उद्धार”
सहकारिता समाज केलिए क्यों जरूरी
के ध्येय को लेकर सहकारिता आंदोलन की वृद्धि शुद्धि और समृद्धि के लिए सतत् प्रयत्नशील
“सहकार भारती” के 47 वां स्थापना दिवस 11 जनवरी की सभी सहकारी, को-आपरेटिव मित्रों, कार्यकर्ताओ को
हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
🙏
शिक्षित युवाओं का सहकारिता से जुड़ने का सुनहरा अवसर
कोआपरेटिव सोसायटी व एफ.पी.ओ. हो सकते युवाओं केलिए शुरुआत का एक महत्वपूर्ण माध्यम 2021में नया कोआपरेटिव मंत्रालय बनने के बाद एक नई सोच
लेखः एस डी तिवारी, उत्तर क्षेत्रीय संगठन प्रमुख सहकार भारती
20201 के बाद प्रधानमंत्री भारत सरकार द्वारा नये सहकारिता मंत्रालय के गठन से सहकारिता क्षेत्र को बहुत उम्मीदे जागी हैं।
2022-2023 लोकसभा में सहकारिता बिल पास करवाया बड़ी मात्रा सहकारिता क्षेत्र में बहुत सुधार किया और देश में नई कोआपरेटिव सोसायटी बनाने का लक्ष्य रखा,
देश भर में लाख पैक्स, लाख दुग्ध डेयरी सोसायटी को मंजूरी दी
इसी के साथ तीन मल्टी-स्टेट सहकारी समितियां के निमार्ण कार्य भी शुरू किया,
अब देश में नौजवान को नौकरियां के पिछे हटकर सहकारिता आंदोलन के साथ जुड़े।
आने वाले दिनों में सहकारिता का दायरा बहुत बढ़ेगा व सहकारिता किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहेंगी।
सहकारिता में अभी नए-नए प्रयोग किये जा रहें है और नए-नए आविष्कार भी होंगे।
देखना यह होगा कि शिक्षित युवाओं को सहकारिता के क्षेत्र में कैसे आकर्षित कर जोड़ा जाये।
आज के युवा को निजी व सार्वजानिक क्षेत्र की तो जानकारी है वह इन्ही में अपनी आजीविका को देखता है।
जबकि उसकी नजर में सहकारिता को आउटडेटिड फ़ैशन वाला प्रोफेशन समझा जाता है।
जिसकी वजह से सहकारिता क्षेत्र शिक्षित युवाओं से वंचित है।
समय आ गया है कि अब लीक से हटकर सोचा जाए।
क्षेत्रीय संगठन प्रमुख होने के नाते सहकार भारती द्वारा यह भी सुझाव दिया गया था कि सहकारिता जागरूकता के लिए इसे स्कूली शिक्षा में एक विषय पाठयक्रम के तौर पर जोड़ा जाना चाहिए।
विधायार्थी को शिक्षा के साथ- साथ सहकारिता क्षेत्र की भी जानकारी मिल सकें ताकि इस क्षेत्र के प्रति भी उनकी रूचि पैदा हो।
गृह एवं सहकारिता मंत्री आदरणीय अमित शाह जी भारत सरकार ने यह मांग भी मान ली है।
भारत का पहले राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय, त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (Tribhuvan Sahkari University – TSU) का शिलान्यास और भूमि पूजन 5 जुलाई, 2025 को गुजरात के जिला आणंद में केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने किया,
जो देश के सहकारी क्षेत्र में पेशेवर और प्रशिक्षित जनशक्ति तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, और यह ‘सहकार से समृद्धि’ के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र है अपना
माननीय अमित शाह जी यही नहीं रुके भारत की नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 (National Cooperative Policy 2025) 24 जुलाई, 2025 को घोषित की गई थी, जिसका उद्देश्य अगले दो दशकों के लिए सहकारी क्षेत्र के व्यवस्थित और समावेशी विकास का रोड़मैप तैयार करना है, जो “सहकार से समृद्धि” के सिद्धांत पर आधारित है और हर गांव में एक समिति बनाने तथा डिजिटल परिवर्तन पर केंद्रित है।
दुसरी तरफ भारत सरकार के सहकारिता मंत्री जी ने सहकारिता क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया हैं।
कोआपरेटिव क्षेत्र में एक नई चैन बना दी है
1- भारत टैक्सी सहकारी सेवा (सहकार टैक्सी) 2- त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय
3- राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL)
4- राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL)
5- भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL)
6- राष्ट्रीय सहकारी लॉजिस्टिक्स लिमिटेड (NCLL)
7- राष्ट्रीय सहकारी डिजिटल लिमिटेड (NCDL) 8- राष्ट्रीय सहकारी स्वास्थ्य लिमिटेड
भारत सरकार को मेरा सुझाव है कि
दुसरी तरफ कृषि मंत्रालय द्वारा देश भर में 10,000 दस हजार एफ.पी. ओज. (फार्मर्स प्रोडूसर ओर्गेनाइजेशनसंस) का गठन का काम चल रहा है।
जिनका फार्मेशन व प्रमोशन “क्लस्टर बेस्ड बिज़नस ओर्गेनाइजेशनसंस” (सी.बी.बी. ओज.) के माध्यम से किया जायेगा।
इसी प्रकार एफ.एफ.पी. ओज. (फिश फार्मर्स प्रोडूसर ओर्गेनाइजेशनसंस) का गठन भी मत्स्यपालन विभाग भारत सरकार द्वारा किया जा रहा है।
वह भी सी.बी.बी.ओज. के माध्यम से किये जाने हैं सी.बी.बी.ओ. के चयन प्रक्रिया हेतु कुछ निर्धारित योग्यता, नियम व शर्तें रखी गई हैं।
जबकि सी.बी.बी.ओ के साथ के अभी तक के अनुभव में प्रायः यह देखा गया है कि सी.बी.बी.ओ. प्राइवेट कम्पनीज हों या कृषि विज्ञानं केंद्र (के.वी.के.), उनके पास उपयुक्त स्टाफ पर्याप्त संसाधन आदि की कमी है
और वर्किंग कैपिटल की कोई व्यवस्था नहीं है।
दोनों ही लोकल युवाओं को कम वेतन पर रखकर काम चला रहे हैं।
यह भी देखा गया है कि प्राइवेट सी.बी.बी.ओ. कम्पनी जोकि अन्य-अन्य प्रदेशों में जाकर काम कर रही हैं।
जिन्हें सिर्फ 2-3 एफ.पी. ओज. हर राज्य में या जिलास्तर पर आवंटित किये गए हैं उन्हें तो ये घाटे का सौदा लगता है। उनका उदेश्य पैसा बचाने व कमाने का होता है। जबकि कम वेतन पर युवा ज्वाइन तो करता है लेकिन स्थाई तौर पर रुकते नहीं, जिसकी वजह से दोनों ही सी.बी.बी.ओ. एवं एफ.पी.ओ. का काम सुस्त व ढीला चल रहा है और इस में वर्किंग कैपिटल चाहिए उसके बारे इस में कोई प्रावधान नहीं है यह भी एक बहुत बड़ा कारण है।सरकार चाहे तो सहकार भारती नये एफ.पी.ओ गठन में शुरूआत से सहयोग लेने के बारे सोच सकती हैं एवं सभी प्रदेशों को अपनी सेवाए प्रदान कर सकती हैं। साथ ही साथ यह कदम एक स्टार्ट-अप के रूप में शिक्षित युवाओं के बीच उन्हें सहकारिता के क्षेत्र में आकर्षित कर जोड़ने का एक कारगार माध्यम बन सकता है। इससे न केवल युवक स्वरोजगारी बन पायेंगे बल्कि औरों के लिए भी रोजगार सृजन करेंगे।
🫡
एस डी तिवारी
उत्तर क्षेत्रीय संगठन प्रमुख
सहकार भारती
AnyTime News
