भारत टैक्सी’ लॉन्च—सहकारिता का नया मॉडल या बाजार में सरकारी दखल?

 कमीशन-फ्री का दावा, लेकिन क्या टिक पाएगा नया टैक्सी प्रयोग?


केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा देश की पहली सहकारिता-आधारित टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’ का शुभारंभ बड़े दावों और भव्य आयोजन के बीच किया गया, लेकिन इस नई पहल ने टैक्सी सेक्टर में प्रतिस्पर्धा, व्यवहारिकता और सरकारी भूमिका को लेकर बहस भी तेज कर दी है। 100 कारों की रैली और 1,200 से अधिक ड्राइवर पार्टनर्स की मौजूदगी ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक बताया, मगर सवाल यह है कि क्या यह मॉडल वास्तव में ड्राइवरों को मालिक बनाएगा या फिर एक और जटिल व्यवस्था बनकर रह जाएगा?

अमित शाह ने कहा कि ‘भारत टैक्सी’ सरकार नहीं, बल्कि सहकारिता के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के लोगों को मालिकाना हक देने का प्रयास है। दावा किया गया कि यह सेवा कमीशन नहीं काटेगी और मुनाफा सीधे “सारथियों” के खाते में जाएगा। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बिना कमीशन के बड़े स्तर पर प्लेटफॉर्म चलाना आर्थिक रूप से कितना टिकाऊ होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

सरकार का कहना है कि ‘भारत टैक्सी’ तीन साल के भीतर देशभर में उपलब्ध होगी और इसका मूल मंत्र स्वामित्व, सुरक्षा, सम्मान और समान लाभांश है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि पहले से मौजूद निजी टैक्सी कंपनियों के मजबूत नेटवर्क और तकनीकी ढांचे के सामने नए प्लेटफॉर्म को स्थापित करना आसान नहीं होगा।

दिलचस्प बात यह भी है कि लॉन्च के तुरंत बाद कुछ बड़ी कंपनियों द्वारा कमीशन घटाने और डिस्काउंट देने की चर्चा सामने आई, जिसे सरकार इस पहल की शुरुआती सफलता मान रही है। वहीं, विरोधी इसे बाजार में दबाव बनाने की रणनीति बता रहे हैं।

‘सारथी दीदी’ जैसी विशेष सुविधा महिलाओं की सुरक्षा और रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पेश की गई है, जबकि ड्राइवरों को ₹5 लाख तक मुफ्त इलाज, बीमा, सस्ते लोन और गिग वर्कर योजनाओं का लाभ देने का वादा किया गया है। परंतु विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि वादों को जमीन पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस, DMRC, AAI, SBI और Paytm सहित नौ प्रमुख संस्थानों के साथ हुए समझौते इस परियोजना को मजबूत आधार देने की कोशिश माने जा रहे हैं। फिर भी यह चिंता बनी हुई है कि क्या सहकारी ढांचा तेज रफ्तार डिजिटल टैक्सी बाजार में निजी कंपनियों जैसी दक्षता दिखा पाएगा?

सहकारिता मॉडल की सफलता के उदाहरण के तौर पर अमूल और इफको का जिक्र किया गया, लेकिन टैक्सी जैसे हाई-टेक और रियल-टाइम सर्विस सेक्टर में वही फॉर्मूला कितना कारगर होगा, इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।

कुल मिलाकर ‘भारत टैक्सी’ को ड्राइवर सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, मगर इसकी असली परीक्षा तब होगी जब यह सेवा यात्रियों की अपेक्षाओं, तकनीकी चुनौतियों और बाजार की कड़ी प्रतिस्पर्धा पर खरी उतरेगी। फिलहाल, यह पहल उम्मीदों के साथ-साथ कई अनुत्तरित सवाल भी छोड़ गई है।

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