एनीटाइम न्यूज नेटवर्क्र। उत्तर प्रदेश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के नाम पर सामान्य वर्ग की सीटों को सुनियोजित तरीके से निगला जा रहा है। स्थिति यह है कि 10 प्रतिशत निर्धारित ईडब्ल्यूएस आरक्षण को घोषित सीमा से कहीं आगे बढ़ाकर लगभग 20 प्रतिशत तक लागू किया जा रहा है, जो न केवल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि सीधे-सीधे जनरल वर्ग के अधिकारों पर डकैती के समान है। इसका ताज़ा और चौंकाने वाला उदाहरण उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आया है, जहाँ मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की निगरानी में 7 जनवरी को 53 डॉक्टरों की भर्ती वॉक-इन इंटरव्यू के माध्यम से की जा रही है। आश्चर्यजनक रूप से, इन 53 पदों में से 10 सीटें ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षित कर दी गई हैं, जबकि ईडब्ल्यूएस का संवैधानिक आरक्षण केवल 10 प्रतिशत है। यह साफ संकेत है कि ईडब्ल्यूएस के नाम पर जनरल कैटेगरी की सीटों की खुली लूट हो रही है। गौरतलब है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण केवल सामान्य वर्ग के लिए है, यह न तो एससी, एसटी और न ही ओबीसी वर्ग पर लागू होता है। बावजूद इसके, उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अधिकारी मनमाने ढंग से जनरल सीटों को काटकर ईडब्ल्यूएस में डाल रहे हैं, जिससे वास्तविक मेरिट और समान अवसर की अवधारणा पूरी तरह खत्म होती जा रही है।
उत्तर प्रदेश में आरक्षण की भयावह स्थिति-एससी : 21% एसटी : 2% ओबीसी : 27% ईडब्ल्यूएस : 10% ➡️ कुल आरक्षण : 60% हालाँकि सरकार यह तर्क देती है कि 103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के कारण ईडब्ल्यूएस आरक्षण वैध है, लेकिन यह संशोधन ईडब्ल्यूएस को 10 प्रतिशत से अधिक देने की इजाज़त नहीं देता। इसके बावजूद, भर्ती प्रक्रियाओं में बार-बार नियमों को तोड़ना यह दर्शाता है कि सरकार के लिए संविधान नहीं, सुविधा सर्वोपरि है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति सामाजिक न्याय नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय को जन्म दे रही है। एक ओर एससी-एसटी और ओबीसी वर्गों के हजारों पद वर्षों से खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर जनरल वर्ग की सीमित सीटों पर ईडब्ल्यूएस के नाम पर लगातार कब्ज़ा किया जा रहा है।
यह सवाल अब बेहद गंभीर हो चुका है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार आरक्षण नीति को राजनीतिक प्रयोगशाला बना चुकी है? क्या जनरल वर्ग के युवाओं के लिए अब कोई संवैधानिक सुरक्षा शेष नहीं बची है? और क्या प्रशासनिक अधिकारी जानबूझकर नियमों की अनदेखी कर रहे हैं? यदि इस तरह ईडब्ल्यूएस के नाम पर जनरल सीटों की “डकैती” जारी रही, तो आने वाले समय में यह मामला केवल सामाजिक असंतोष तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कानूनी और संवैधानिक टकराव का रूप ले सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार को तत्काल ईडब्ल्यूएस आरक्षण की सीमा का पालन, सभी भर्तियों की स्वतंत्र जांच, और दोषी अधिकारियों पर जवाबदेही तय करनी चाहिए, अन्यथा यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार न्याय नहीं, आंकड़ों और आरक्षण की आड़ में राजनीति कर रही है।
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