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सत्ता के गलियारों में इंसाफ़ की आवाज़ क्यों धीमी पड़ती दिख रही है?

एक वैचारिक चेतावनी, एक राजनीतिक आत्ममंथन

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। महाराष्ट्र की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ सवाल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विवेक का है जो सत्ता के साथ चलते-चलते अक्सर कमजोर पड़ जाता है।
सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली इंसाफ़ की आवाज़ क्या सचमुच दब रही है—या फिर हम उसे सुनना ही नहीं चाहते?

अजीत पवार जैसे नेता राजनीति में केवल पद या सत्ता का प्रतीक नहीं रहे हैं। वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने प्रशासनिक कठोरता और सामाजिक संतुलन के बीच एक महीन रेखा खींची। उनकी राजनीति हमेशा शोर में नहीं रही, लेकिन निर्णयों में साफ़ दिखाई दी।

आज जब राजनीति तेज़ ध्रुवीकरण, भावनात्मक उकसावे और तात्कालिक लाभ की ओर बढ़ रही है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या सत्ता में रहते हुए भी संवेदनशीलता ज़िंदा रह सकती है?

अजीत पवार का राजनीतिक सफ़र बताता है कि मतभेद हो सकते हैं, गठबंधन बदल सकते हैं, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी और सामाजिक न्याय को पूरी तरह छोड़ा नहीं जाना चाहिए। यही वजह है कि वे समर्थकों के साथ-साथ आलोचकों के बीच भी एक “कार्यकुशल नेता” के रूप में पहचाने गए।

अल्पसंख्यक कल्याण, किसानों के मुद्दे, सहकारी आंदोलन और प्रशासनिक फैसलों में उन्होंने अक्सर यह संकेत दिया कि
राजनीति केवल बहुमत का उत्सव नहीं, बल्कि सभी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है।

आज का सबसे बड़ा खतरा किसी पार्टी या नेता से नहीं, बल्कि उस सोच से है जहाँ सत्ता में पहुँचने के बाद संवैधानिक मूल्यों को “समायोजन” का विषय बना दिया जाता है।
इंसाफ़ तब नहीं मरता जब उस पर हमला होता है—
इंसाफ़ तब कमजोर पड़ता है जब उसके पक्ष में खड़े लोग चुप हो जाते हैं।

यह लेख किसी व्यक्ति का महिमामंडन नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—
कि अगर सत्ता के भीतर से संतुलित, संवेदनशील और न्यायप्रिय आवाज़ें कमजोर होंगी,
तो लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाएगा।

आज ज़रूरत है सवाल पूछने की—

  • क्या सत्ता में रहकर भी नैतिक साहस बचाया जा सकता है?

  • क्या गठबंधन की राजनीति में भी अल्पसंख्यकों और हाशिये पर खड़े समाज का भरोसा कायम रह सकता है?

  • और सबसे अहम—क्या राजनीति अब भी इंसाफ़ की भाषा समझती है?

यह संपादकीय किसी के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में है।
क्योंकि जब इंसाफ़ की आवाज़ धीमी पड़ती है,
तो इतिहास सिर्फ़ नेताओं को नहीं—खामोश समाज को भी कठघरे में खड़ा करता है।

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