वसुधैव कुटुंबकम् के लिए हिंदी बन सकती है माध्यम प्रो. शुक्ल

 

हिंदी विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षकों के लिए अभिविन्यास कार्यक्रम

’ 12 दिवसीय कार्यक्रम में 22 देशों से 34 शिक्षक हुए शामिल
’ विश्वविद्यालय और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् का संयुक्त आयोजन

टीटू ठाकुर

वर्धा।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा है कि दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम् की दृष्टि की जरूरत है। इस दृष्टि को व्यापकता प्रदान करने में हिंदी एक सशक्त माध्यम बन सकती है। प्रो. शुक्ल को अंतरराष्ट्रीय हिंदी शिक्षकों के लिए अभिविन्यास कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए संबोधित कर रहे थे। विश्वविद्यालय और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली (आईसीसीआर) के बीच हुए एक स्थायी अनुबंध के अंतर्गत 7 से 19 अगस्त तक अभिविन्यास कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, जिसमें विश्व भर के 22 देशों के 34 प्रतिनिधि सहभागी हुए हैं। कार्यक्रम उद्घाटन ग़ालिब सभागार में संपन्न हुआ। इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की उप महानिदेशक अंजू रंजन प्रति-कुलपति द्वय प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल एवं प्रो. चंद्रकांत रागीट, कुलसचिव कादर नवाज़ खान, कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. कृष्ण कुमार सिंह मंचासीन थे।

अंतरराष्ट्रीय पटल पर हिंदी की महत्ता को रेखांकित करते हुए प्रो. शुक्ल ने कहा कि उपनिवेशवाद के काल में भारत से विभिन्न देशों में गिरमिटिया मजदूर गये और अपना देश मानकर वहीं रच-बस गये। उन्होंने गांधी को आधुनिकता की आलोचना करने वाले पहले व्यक्ति करार देते हुए कहा कि गांधी ने दुनिया को यांत्रिकता से मुक्ति का विचार दिया। कुलपति ने कहा कि हिंदी सर्वत्र सृजन की भाषा है। हिंदी विश्व को बचाने का माध्यम है। अंहिसक समाज और पारिस्थितिकी का पुनसर््थापन करने में हिंदी अग्रगामी भाषा है। वर्धा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थान गांधी और विनोबा की कर्मस्थलि और भारत का चौराह है। विदर्भ की यह धरती विठ्ठल और रुक्मिनी के विचार से सिंचित हुई है।
सारस्वत अतिथि के रूप में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की उप-महानिदेशक अंजू रंजन ने कहा कि विभिन्न देशों से आये प्रतिभागी भारतीय संस्कृति और गांधी जी से मिलने आये हैं। 12 दिवसीय कार्यक्रम में प्रतिभागी हिंदी के आधुनिकीकरण से लेकर सांस्कृतिक संबंध को विकसित करने का काम करेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बल मिलेगा। स्वागत वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रभारी प्रति-कुलपति प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल ने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की पहल पर ऑनलाइन एवं ऑफलाइन हिंदी शिक्षण के अकादमिक प्रबंधन का दायित्व विश्वविद्यालय को मिला है।
कार्यक्रम में लंदन, मास्को, बैंकाक, बर्लिन, बुडापेस्ट, कैरो, कोलंबो, यागोन, डर्बन, दुसांबे, जॉर्जटाउन, काठमांडू, कुआलालम्पुर, पारामारिबो, पोर्ट ऑफ स्पेन, सुवा, ताश्कंद, तेहरान, द हेग, थिम्फू, हनोइ, दर ए सलाम आदि स्थानों में कार्यरत शिक्षक प्रतिभागिता कर रहे हैं। इन शिक्षकों को भाषा शिक्षण, अनुवाद, हिंदी भाषा संरचना, हिंदी का अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य, भारतीय साहित्य, संस्कृति, रामायण, महाभारत, कुटुंब व्यवस्था एवं विवाह संस्कार, भारतीय शिक्षा प्रणाली, योग, कला, ज्ञान परंपरा आदि विषयों से परिचित कराया जाएगा। कार्यक्रम के अंतर्गत रामटेक, अजंता एवं एलोरा का सांस्कृतिक भ्रमण भी सम्मिलित है। उद्घाटन समारोह में वासुदेवशरण अग्रवाल की रचनाओं से संग्रहित श्राष्ट्र, धर्म और संस्कृतिश् पुस्तक का लोकार्पण किया गया। प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल इस पुस्तक के संपादक हैं।
प्रतिभागियों का स्वागत सूतमाला, अंगवस्त्र एवं विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह भेंट कर किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन, मंगलाचरण और कुलगीत से तथा समापन राष्ट्रगान से हुआ। कार्यक्रम का संचालन नोडल अधिकारी डॉ. प्रियंका मिश्रा ने तथा आभार ज्ञापन कुलसचिव क़ादर नवाज़ ख़ान ने किया। इस अवसर पर आवासीय लेखक प्रो. रामजी तिवारी, निंदर घुगियानवी, अधिष्ठातागण, विभागाध्यक्ष, अध्यापक अधिकारी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

 

 

 

 

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