गोसंरक्षण के बड़े दावे, जमीनी हकीकत पर सवाल: करोड़ों खर्च के बावजूद बदहाल गौशालाएं”

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंश संरक्षण को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर लगातार सवाल खड़े कर रही है। पशुधन मंत्री श्री धर्मपाल सिंह द्वारा 14 जनपदों में 18 नवनिर्मित वृहद गोसंरक्षण केंद्रों के लोकार्पण के साथ जहां उपलब्धियों का बखान किया गया, वहीं दूसरी ओर प्रदेश में गोवंश संरक्षण की वास्तविक स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 7497 गोआश्रय स्थलों में 12 लाख से अधिक निराश्रित गोवंश संरक्षित हैं और प्रतिदिन लगभग 6.5 करोड़ रुपये उनके भरण-पोषण पर खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद आए दिन गौशालाओं में अव्यवस्था, चारे की कमी, बीमार गोवंश और रखरखाव में लापरवाही की खबरें सामने आती रहती हैं। सवाल यह उठता है कि जब इतनी बड़ी धनराशि खर्च की जा रही है, तो फिर गोवंश की दुर्दशा क्यों नहीं रुक पा रही?

मंत्री ने निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से कोई समझौता न करने की बात कही, लेकिन पूर्व में कई गोसंरक्षण केंद्रों की जर्जर हालत, अधूरी सुविधाएं और रखरखाव में अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। कई जिलों में स्थानीय स्तर पर ग्राम प्रधानों और केयरटेकर्स की कमी, निगरानी तंत्र की कमजोरी और जवाबदेही के अभाव के कारण योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं।

प्रदेश सरकार ने 630 वृहद गोसंरक्षण केंद्रों की स्वीकृति दी है, जिनमें से 410 ही पूरी तरह क्रियाशील बताए जा रहे हैं। यानी बड़ी संख्या में केंद्र या तो निर्माणाधीन हैं या अपेक्षित क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पा रहे। वहीं, प्रत्येक केंद्र में 400 गोवंश रखने की क्षमता होने के बावजूद कई स्थानों पर इससे कहीं अधिक गोवंश ठूंसे जाने की शिकायतें भी मिलती रही हैं, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

सरकार गोबर से उत्पाद, सीबीजी यूनिट और महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी को आत्मनिर्भरता का मॉडल बता रही है, लेकिन इन प्रयोगों का लाभ अभी सीमित दायरे में ही नजर आ रहा है। ग्रामीण स्तर पर रोजगार सृजन के दावे भी तब तक खोखले प्रतीत होते हैं, जब तक योजनाओं की पारदर्शी निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं किया जाता।

कुल मिलाकर, गोसंरक्षण के नाम पर भारी बजट, बड़े उद्घाटन और सरकारी घोषणाओं के बावजूद, वास्तविक चुनौती जमीनी सुधार की है। जब तक व्यवस्थाओं में जवाबदेही, नियमित निरीक्षण और स्थानीय स्तर पर ठोस सुधार नहीं होंगे, तब तक गोवंश संरक्षण पर उठते सवाल थमने वाले नहीं हैं।

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