महिला सुरक्षा पर बड़े दावे, ज़मीन पर सवाल बरकरार

कड़े कानून, योजनाएं और हेल्पलाइन के बावजूद एसिड हमले व महिला अपराध रोकने में सिस्टम की प्रभावशीलता पर उठे सवाल

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क।। केंद्र सरकार भले ही महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर मजबूत कानूनी ढांचे, योजनाओं और वित्तीय सहायता का दावा कर रही हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि गंभीर अपराधों—खासतौर पर एसिड हमलों—को लेकर अब भी कई स्तरों पर चुनौतियां बनी हुई हैं। सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को समर्थन देने के लिए अनेक कदम उठाने की बात कही है, फिर भी सवाल उठ रहा है कि क्या इन उपायों का असर जमीन पर पर्याप्त रूप से दिखाई दे रहा है?

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के तहत एसिड हमले को गंभीर अपराध मानते हुए कम से कम 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है। प्रयास की स्थिति में भी पांच से सात वर्ष की सजा तय है। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं होता—उनका सख्ती से पालन और त्वरित न्याय उतना ही जरूरी है।

संविधान के अनुसार “पुलिस” और “सार्वजनिक व्यवस्था” राज्य का विषय है, जिससे जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों पर आ जाता है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि जांच में देरी, लंबित मुकदमे और पीड़ितों को समय पर मुआवजा न मिलना, न्याय प्रक्रिया को कमजोर कर देता है।

केंद्र सरकार ने निर्भया कोष के तहत राज्यों को 200 करोड़ रुपये की सहायता दी और पीड़ित मुआवजा योजनाएं लागू करने पर जोर दिया। साथ ही, “मिशन शक्ति”, वन स्टॉप सेंटर, 181 महिला हेल्पलाइन और 112 आपातकालीन सेवा जैसी व्यवस्थाएं भी शुरू की गईं। 31 दिसंबर 2025 तक करोड़ों महिलाओं को सहायता देने का दावा किया गया है।

फिर भी जमीनी स्तर पर कई पीड़ितों को चिकित्सा, पुनर्वास और कानूनी सहायता पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। महिला हेल्प डेस्क की स्थापना और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बावजूद पुलिस की संवेदनशीलता और प्रतिक्रिया समय पर लगातार बहस होती रही है।

एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए मॉडल विष नियम जारी किए गए, लेकिन कई इलाकों में रसायनों की उपलब्धता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक निगरानी सख्त नहीं होगी और स्थानीय प्रशासन जवाबदेह नहीं बनेगा, तब तक ऐसे अपराधों पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल होगा।

राष्ट्रीय महिला आयोग और अन्य संस्थाएं जागरूकता अभियान चला रही हैं, पर सामाजिक मानसिकता में बदलाव की रफ्तार धीमी है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है—क्या योजनाएं और आंकड़े महिलाओं को वास्तविक सुरक्षा दे पा रहे हैं, या यह लड़ाई अभी लंबी है ?

About ATN-Editor

Anytime news:- Web News portal, weekly newspaper, YouTube news channel,

Check Also

Empowering Youth via Institutional Skill Alignment: UP Cane Development Department Partners with Wadhwani Foundation

By Pooja Shrivastava, Any Time News Network  In a major institutional move to enhance industrial …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *