पांच दिवसीय बैंकिंग से सरकार का इंकार, बैंककर्मियों का सब्र टूटा

देशव्यापी रैली के साथ चेतावनी—अब आर-पार की लड़ाई तय

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले बैंककर्मियों की एक एकमात्र और जायज़ मांग—पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था को केंद्र सरकार द्वारा लगातार नजरअंदाज किए जाने से आक्रोश अब सड़कों पर साफ दिखाई देने लगा है। रिजर्व बैंक, एलआईसी, सेबी, नाबार्ड और राज्य सरकारों में जहां पहले से ही पांच दिवसीय कार्य प्रणाली लागू है, वहीं बैंकों को इससे वंचित रखा जाना बैंककर्मियों के साथ सौतेला व्यवहार माना जा रहा है।

इसी भेदभावपूर्ण नीति के विरोध में यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के बैनर तले लखनऊ में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा से एक विशाल रैली निकाली गई, जो सभा में तब्दील हो गई। रैली में शामिल बैंककर्मियों ने सरकार के रवैये को हठधर्मिता और कर्मचारी विरोधी सोच करार दिया।

प्रदर्शन, धरना, सोशल मीडिया… फिर भी सरकार बेपरवाह

फोरम के जिला संयोजक अनिल श्रीवास्तव ने कहा कि बैंककर्मियों ने बीते समय में धरना-प्रदर्शन से लेकर ट्विटर अभियान तक हर लोकतांत्रिक तरीका अपनाया, लेकिन सरकार ने अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सभी वित्तीय नियामक और सरकारी संस्थान पांच दिवसीय हो सकते हैं, तो बैंककर्मियों को अतिरिक्त मानसिक और शारीरिक दबाव में क्यों रखा जा रहा है?

बढ़ता कार्यभार, घटता संतुलन

सभा को संबोधित करते हुए कॉमरेड लक्ष्मण सिंह ने कहा कि बैंककर्मियों पर लगातार बढ़ते कार्यभार, डिजिटल लक्ष्य, ऋण वसूली और ग्राहक दबाव के बावजूद सरकार संवेदनहीन बनी हुई है। उन्होंने चेताया कि यह सिर्फ कार्यदिवस का मुद्दा नहीं, बल्कि कर्मचारियों के स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन से जुड़ा सवाल है।

एस.के. संगतानी ने साफ कहा कि यदि सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। उन्होंने इसे बैंककर्मियों के आत्मसम्मान की लड़ाई बताया।

27 जनवरी की हड़ताल, फिर अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी

सभा में मौजूद बैंक नेताओं ने केंद्र सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि 27 जनवरी की देशव्यापी एक दिवसीय हड़ताल केवल चेतावनी है। यदि इसके बाद भी सरकार नहीं चेती, तो बैंककर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल के लिए मजबूर होंगे।

मीडिया प्रभारी अनिल तिवारी ने बताया कि 27 जनवरी को हजरतगंज स्थित इंडियन बैंक के सामने दोपहर 12 बजे विशाल प्रदर्शन और सभा आयोजित की जाएगी।

सरकार की चुप्पी पर सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह रवैया न केवल बैंककर्मियों में असंतोष बढ़ा रहा है, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था को भी अस्थिरता की ओर धकेल सकता है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका सीधा असर आम जनता और वित्तीय प्रणाली पर पड़ेगा।

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