दावों की सिंचाई, जमीन पर सूखा?

योजनाएं बड़ी, पानी अब भी कम!

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क।: प्रदेश सरकार जहां किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधाएं और जल संरक्षण का भरोसा दे रही है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों पर कई सवाल खड़े कर रही है। जलशक्ति मंत्री की अध्यक्षता में हुई लघु सिंचाई व भूगर्भ जल विभाग की समीक्षा बैठक में बड़े पैमाने पर योजनाओं और उपलब्धियों का उल्लेख किया गया, लेकिन जल संकट से जूझ रहे कई क्षेत्रों में अब भी हालात अपेक्षित सुधार से दूर बताए जा रहे हैं।

सरकार ने बुंदेलखंड में 1.37 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता विकसित करने और हजारों नलकूप व चेकडैम बनाने का दावा किया है, मगर स्थानीय किसानों का कहना है कि कई परियोजनाएं कागजों तक सीमित हैं या उनकी प्रभावशीलता पर सवाल हैं। गर्मियों में जलस्तर तेजी से गिरने की समस्या अब भी बरकरार है, जिससे खेती प्रभावित होती है।

अमृत कूप योजना और सोलर पंपसेट जैसे प्रयासों को राहत के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भूगर्भ जल पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में संकट को और गहरा सकती है। पुराने चेकडैमों की मरम्मत और नए निर्माण की बात जरूर हो रही है, पर कई स्थानों पर रखरखाव की कमी से इन संरचनाओं का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

सरकार का यह भी दावा है कि जल संरक्षण के कदमों से पलायन रुका है और किसानों की आय बढ़ी है, जबकि ग्रामीण इलाकों से रोजगार की तलाश में हो रहा पलायन पूरी तरह थमा नहीं है। ऐसे में योजनाओं के वास्तविक प्रभाव पर पारदर्शी आकलन की जरूरत महसूस की जा रही है।

बैठक में भविष्य की रणनीति और बेहतर क्रियान्वयन पर जोर दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या नई घोषणाएं पुराने अधूरे कार्यों की भरपाई कर पाएंगी? जब तक योजनाओं की निगरानी, रखरखाव और स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्यान्वयन सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक ‘बेहतर सिंचाई’ का वादा किसानों के लिए अधूरा ही रह सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर सिर्फ आंकड़ों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान जरूरी हैं, वरना हर साल वही समस्याएं नए दावों के साथ सामने आती रहेंगी।

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