नीति आयोग की हरित रोडमैप रिपोर्ट पर सवाल: एमएसएमई के लिए अवसर या नया बोझ?

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। नीति आयोग द्वारा सीमेंट, एल्युमीनियम और एमएसएमई क्षेत्रों में हरित परिवर्तन को लेकर तीन अहम रिपोर्ट जारी की गईं, लेकिन एमएसएमई पर केंद्रित रोडमैप को लेकर उद्योग जगत में गंभीर आशंकाएं उभरने लगी हैं। देश के औद्योगिक ढांचे की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई पहले ही महंगी ऊर्जा, सीमित वित्त और जटिल नियमों से जूझ रहे हैं, ऐसे में “हरित परिवर्तन” उनके लिए अवसर से ज्यादा बोझ बन सकता है।

रिपोर्ट में एमएसएमई के लिए ऊर्जा-कुशल उपकरणों की तैनाती, वैकल्पिक ईंधन अपनाने और हरित बिजली के एकीकरण को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश सूक्ष्म और छोटे उद्यमों के पास न तो महंगे ऊर्जा-कुशल उपकरण खरीदने की पूंजी है और न ही सस्ती हरित बिजली की स्थिर उपलब्धता। उद्योग संगठनों का कहना है कि बिना ठोस वित्तीय सहायता और सब्सिडी के यह रोडमैप कागजों तक सीमित रह सकता है।

एमएसएमई देश के जीडीपी में लगभग 30% योगदान देते हैं और 25 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। बावजूद इसके, हरित परिवर्तन के नाम पर यदि अतिरिक्त अनुपालन, नई तकनीक और लागत थोप दी गई, तो छोटे उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है। कई उद्यमियों को आशंका है कि बड़े उद्योग तो हरित मानकों के अनुरूप खुद को ढाल लेंगे, लेकिन छोटे कारोबारी या तो पीछे छूट जाएंगे या बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं।

नीति आयोग ने किफायती वित्त, कौशल विकास और नियामक सुधारों की बात जरूर की है, लेकिन एमएसएमई का अनुभव रहा है कि नीतिगत घोषणाओं और वास्तविक लाभ के बीच बड़ा अंतर होता है। बैंकों से सस्ता ऋण, सरल नियम और तकनीकी सहायता अब भी अधिकांश इकाइयों के लिए दूर की बात है। यदि हरित मानकों को अनिवार्य किया गया, तो यह “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के दावों पर भी सवाल खड़े करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि हरित परिवर्तन जरूरी है, लेकिन इसे एमएसएमई की क्षमता के अनुरूप चरणबद्ध और प्रोत्साहन-आधारित बनाना होगा। अन्यथा, 2047 के विकसित भारत के सपने में एमएसएमई कमजोर कड़ी बन सकते हैं, जिसका सीधा असर रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

https://niti.gov.in/sites/default/files/2026-01/Roadmap_for_Green_Transition_of_MSMEs.pdf

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