भारत में जमा बीमा के लिए ‘रिस्क-बेस्ड प्रीमियम’ फ्रेमवर्क लागू, बेहतर बैंकों को मिलेगा कम प्रीमियम

1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा नया सिस्टम, मजबूत जोखिम प्रबंधन को मिलेगा 

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। रिजर्व बैंक की स्वीकृति के बाद डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (DICGC) ने भारत में जमा बीमा के लिए रिस्क-बेस्ड प्रीमियम (RBP) फ्रेमवर्क लागू करने की घोषणा की है। यह कदम 1 अक्टूबर 2025 की विकासात्मक एवं नियामकीय नीतियों की घोषणा के अनुरूप उठाया गया है। नए फ्रेमवर्क का उद्देश्य बैंकों को बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करना और मजबूत वित्तीय स्थिति वाले बैंकों के प्रीमियम बोझ को कम करना है।

अब तक DICGC वर्ष 1962 से फ्लैट रेट प्रीमियम सिस्टम पर काम कर रहा था, जिसमें सभी बीमित बैंक आकलनीय जमाओं पर प्रति ₹100 के हिसाब से 12 पैसे प्रीमियम देते थे। हालांकि यह प्रणाली सरल थी, लेकिन जोखिम प्रबंधन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंकों और कमजोर बैंकों के बीच अंतर नहीं कर पाती थी। इसी कमी को दूर करने के लिए आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड ने 19 दिसंबर 2025 को RBP प्रस्ताव को मंजूरी दी।

नए फ्रेमवर्क के तहत दो जोखिम आकलन मॉडल लागू किए जाएंगे। टियर-1 मॉडल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) पर लागू होगा और इसमें सुपरवाइजरी रेटिंग, CAMELS पैरामीटर पर आधारित मात्रात्मक मूल्यांकन तथा बैंक विफल होने की स्थिति में जमा बीमा कोष पर संभावित नुकसान का आकलन शामिल होगा।

वहीं टियर-2 मॉडल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों के लिए होगा, जो मात्रात्मक मूल्यांकन और संभावित नुकसान के आधार पर प्रीमियम तय करेगा।

फ्रेमवर्क के अनुसार, रिस्क मॉडल इंसेंटिव अधिकतम 33.33% तक हो सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक बिना किसी बड़े संकट या क्लेम के DICGC फंड में योगदान देने वाले बैंकों को 25% तक ‘विंटेज इंसेंटिव’ भी मिलेगा। इस प्रकार अंतिम प्रीमियम दर जोखिम रेटिंग और प्रोत्साहनों को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाएगी।

फ्रेमवर्क में यह भी प्रावधान है कि यदि प्रारंभिक जोखिम रेटिंग के बाद कोई प्रतिकूल जानकारी सामने आती है, तो रेटिंग ओवरराइड पॉलिसी लागू की जा सकेगी। साथ ही बैंकों को अपनी रेटिंग और DICGC को दिए गए प्रीमियम की जानकारी गोपनीय रखनी होगी।

लोकल एरिया बैंक और पेमेंट्स बैंक फिलहाल डेटा सीमाओं के कारण RBP मॉडल से बाहर रहेंगे और पहले की तरह 12 पैसे प्रति ₹100 की कार्ड दर से प्रीमियम देते रहेंगे। वहीं, आरबीआई के सुपरवाइजरी एक्शन फ्रेमवर्क (SAF) या प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) के तहत आने वाले शहरी सहकारी बैंक भी कार्ड रेट ही चुकाएंगे और इनसे बाहर आने के बाद अगले वित्तीय वर्ष में RBP के दायरे में लाए जाएंगे।

1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाला यह फ्रेमवर्क कम से कम हर तीन साल में समीक्षा के लिए निर्धारित किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बैंकिंग प्रणाली को अधिक मजबूत, पारदर्शी और जोखिम-संवेदनशील बनाने में मदद करेगा, जिससे जमाकर्ताओं का भरोसा और बढ़ेगा।

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