संवाद या औपचारिकता? महिला आयोग की ‘रु-ब-रु’ मुहिम की प्रभावशीलता पर उठे प्रश्न

‘रु-ब-रु’ पहल पर सवाल—30 हजार छात्रों तक पहुंच का दावा, जमीनी असर कितना?
एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग द्वारा चलाई जा रही “रु-ब-रु” पहल को लैंगिक समानता और सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। संवाद आधारित इस कार्यक्रम का उद्देश्य पुलिस और छात्रों के बीच बातचीत बढ़ाकर सामाजिक बदलाव लाना है, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चर्चाओं से जमीनी स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करना आसान नहीं है।

महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह चौहान के अनुसार, यह पहल अब तक 30,000 से अधिक छात्रों तक पहुंच चुकी है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि कार्यक्रम के बाद अपराध रिपोर्टिंग, सुरक्षा जागरूकता या लैंगिक संवेदनशीलता में कितना ठोस बदलाव आया है। अक्सर ऐसे अभियान जागरूकता तक सीमित रह जाते हैं और दीर्घकालिक परिणाम सामने नहीं आ पाते।

कार्यक्रम में पुलिस अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, साइबर अपराध और बाल संरक्षण जैसे विषयों पर जानकारी दी जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या स्कूलों और कॉलेजों में केवल सत्र आयोजित कर देने से छात्र वास्तव में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं? कई शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा के लिए संस्थागत सुधार, मजबूत शिकायत तंत्र और त्वरित कार्रवाई अधिक जरूरी है।

रु-ब-रु का विस्तार अभिभावकों, शिक्षकों और बस चालकों तक किए जाने की बात भी कही गई है, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कार्यक्रमों की नियमितता और निगरानी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। अक्सर योजनाएं शुरुआत में सक्रिय दिखती हैं, लेकिन समय के साथ उनकी गति धीमी पड़ जाती है।

यूनिसेफ के सहयोग को इस पहल की मजबूती बताया जा रहा है, फिर भी यह देखना बाकी है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार सामग्री वास्तव में स्थानीय चुनौतियों का समाधान कर पा रही है या नहीं। व्यवहार परिवर्तन जैसे बड़े लक्ष्य केवल कार्यशालाओं से हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि आंतरिक शिकायत तंत्र और “शून्य-सहिष्णुता” नीति की बात की जा रही है, तो उसके क्रियान्वयन की पारदर्शी व्यवस्था भी सामने आनी चाहिए। अन्यथा यह पहल भी सरकारी अभियानों की लंबी सूची में शामिल होकर औपचारिकता बनकर रह सकती है।

फिलहाल “रु-ब-रु” को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताया जा रहा है, लेकिन इसकी सफलता का असली पैमाना जमीनी सुरक्षा, अपराध में कमी और पीड़ितों के बढ़ते भरोसे से ही तय होगा।

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