भारत मंडपम से वैश्विक परिदृश्य में इंटीग्रेटिव मेडिसिन के ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत

पारंपरिक चिकित्सा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का ‘दिल्ली घोषणापत्र’

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। पारंपरिक चिकित्सा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन के अवसर पर जारी “दिल्ली घोषणापत्र” के साथ ही एकीकृत चिकित्सा में नये अध्याय की शुरुआत हुई है। पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित, प्रभावी और साक्ष्य-आधारित रूप में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों, विशेषकर प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (न्भ्ब्) पर जोर देते हुये इस घोषणापत्र ने पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा में उभर कर सामने आये नये साक्ष्यों का संज्ञान लिया है। नई दिल्ली के भारत मंडपम में 17 से 19 दिसंबर के बीच आयुष मंत्रालय, भारत सरकार तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित उक्त पारंपरिक चिकित्सा के शिखर सम्मेलन को “संतुलन पुनर्स्थापनारू स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और अभ्यास” विषय पर आयोजित किया गया था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डा. टेड्रोस, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा, आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा राज्य मंत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, श्री प्रतापराव जाधव की उपस्थिति में जारी “दिल्ली घोषणापत्र” को तैयार करने में 100 से अधिक देशों के स्वास्थ्य नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और पारंपरिक चिकित्सा के अन्य हितधारकों ने योगदान दिया। प्रधान मंत्री  नरेन्द्र मोदी ने सम्मलेन के समापन समारोह के अवसर पर वैश्विक स्तर पर एकीकृत चिकित्सा की दिशा में हो रहे नवाचार की सराहना की तथा कहा, “ट्रेडिशनल मेडिसिन को लेकर एक धारणा थी कि इसकी भूमिका केवल वेलनेस या जीवन-शैली तक सीमित है। लेकिन आज ये धारणा तेजी से बदल रही है। क्रिटिकल सिचुएशन में भी ट्रेडिशनल मेडिसिन प्रभावी भूमिका निभा सकती है। इसी सोच के साथ भारत इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। मुझे ये बताते हुए खुशी हो रही है कि आयुष मंत्रालय और ॅभ्व्-ज्तंकपजपवदंस डमकपबपदम ब्मदजमत ने नई पहल की है। दोनों ने, भारत में पदजमहतंजपअम बंदबमत बंतम को मजबूत करने के लिए एक रवपदज मििवतज किया है। इसके तहत पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को आधुनिक कैंसर उपचार के साथ जोड़ने का प्रयास होगा। इस पहल से मअपकमदबम-इंेमक हनपकमसपदमे तैयार करने में भी मदद मिलेगी। भारत में कई अहम संस्थान स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे ही गंभीर विषयों पर क्लिनिकल स्टडीज़ कर रहे हैं। इनमें अनीमिया, आर्थराइटिस और डायबिटीज़ जैसे विषय भी शामिल हैं। भारत में कई सारे स्टार्ट-अप्स भी इस क्षेत्र में आगे आए हैं। प्राचीन परंपरा के साथ युवाशक्ति जुड़ रही है। इन सभी प्रयासों से ट्रेडिशनल मेडिसिन एक नई ऊंचाई की तरफ बढ़ती दिख रही है।”

एकीकृत चिकित्सा में भारत के स्तर से हुये कामों को स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सराहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डा. टेड्रोस के अनुसार ष्आयुष मंत्रालय का गठन और ग्लोबल ट्रेडीशनल मेडीसिन सेंटर की स्थापना कर भारत ने पूरे विश्व को यह बता दिया है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और पारंपरिक चिकित्सा एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के अनुसार, “भारत में जो मॉर्डन मेडिसिन है, उसमें भी काफी परिवर्तन लाया गया है। पहले की स्वास्थ्य नीति में सारा जोर इस बात पर था कि बीमारी को कैसे ठीक किया जाये। नई स्वास्थ्य नीति 2017 हॉलिस्टिक स्वास्थ्य नीति बनी जो कि संपूर्णता में स्वास्थ्य के विचार को प्रेरित करती है। इसमें हैं प्रिवेंशन, प्रमोशन ऑफ हैल्थ, क्यूरेटिव, पैलिएटिव, जेरीऐट्रिक, और माननीय प्रधानमंत्री ने जो जोड़ा, वह है इंटीग्रेटिव मेडिसिन।” प्रतापराव जाधव, माननीय केंद्रीय आयुष मंत्री, भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक अवसर पर “दिल्ली घोषणापत्र” की सराहना करते हुए कहा, “दिल्ली घोषणापत्र पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक वैश्विक रोडमैप प्रस्तुत करती है, जो साक्ष्य, समावेशन और सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित है। यह घोषणापत्र विश्व स्तर पर आयुष और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणालियों से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।” वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार ने दिल्ली घोषणापत्र की महतत्वता को रेखांकित करते हुए कहा, “दिल्ली घोषणापत्र अनुसंधान, मानकीकरण, क्षमता निर्माण और वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित, प्रभावी और सुलभ बनाते हुए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में सहायक होगी।” वर्ष 2022 में गुजरात, गांधीनगर में आयोजित पारंपरिक चिकित्सा के पहले शिखर सम्मेलन से उपजे “गुजरात घोषणापत्र” को आगे बढ़ाते हुये “दिल्ली घोषणापत्र” पारंपरिक चिकित्सा की व्यापकता, मजबूत होते विज्ञान सम्मत साक्ष्य आधार, नवाचार और नये स्वास्थ्य चुनौतियों के लिये नये समाधान की क्षमता को भी रेखांकित किया है। 100 से अधिक देशों, करीब 800 प्रतिभागियों, 20,000 से ज्यादा ऑनलाइन प्रतिभागियों और करीब 3000 से अधिक आमंत्रित सदस्यों के साझे अनुभव से गढ़ गया “दिल्ली घोषणापत्र” चार क्षेत्रों से जुड़े संकल्पों पर मुख्य रूप से केंद्रित है।

ये चार संकल्प हैं-

1. साक्ष्य-आधारित ज्ञान को मजबूत करना
प्रतिभागी देशों ने पारंपरिक चिकित्सा के लिए कठोर, नैतिक और बहु-पक्षीय शोध को बढ़ावा देने का संकल्प लिया, जिसमें परंपरागत ज्ञान के साथ वैज्ञानिक मानकों का संतुलन समाहित हो। वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा पुस्तकालय जैसे संसाधनों से शोध, डेटा और नीति-दस्तावेज़ उपलब्ध होंगे।

2. सुरक्षा, गुणवत्ता और सार्वजनिक विश्वास सुनिश्चित करना
सुरक्षा और गुणवत्ता के लिए सुसंगत, जोखिम-आधारित विनियमन स्थापित करने पर जोर दिया गया है ताकि पारंपरिक चिकित्सा उत्पादों, प्रक्रियाओं और प्रशिक्षकों के मानक स्पष्ट और भरोसेमंद हों।

3. स्वास्थ्य प्रणालियों में सुरक्षित और प्रभावी पारंपरिक चिकित्सा का एकीकरण
विशेष रूप से पारंपरिक चिकित्सा को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करना, खासकर प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (च्भ्ब्) स्तर पर जहाँ से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की नींव रखी जाती है। इसका लक्ष्य है कि पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित, प्रभावी रूप से स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाया जाए, जिससे लोगों को स्थानीय स्तर पर अधिक विकल्प और सुलभ स्वास्थ्य सहायता मिल सके।

4. नवाचार और डिजिटल प्रौद्योगिकी का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग
डिजिटल तकनीकों, डेटा विज्ञान और नवाचार, जैसे एआई तथा जीनोमिक्स, का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा के शोध और डेटा तक पहुंच को बेहतर बनाने के लिए किया जाए। इससे वैश्विक स्तर पर ज्ञान साझा करने और स्वास्थ्य प्रणालियों में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

“दिल्ली घोषणापत्र” के इन संकल्पों को पारंपरिक चिकित्सा पद्यतियों के स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकरण लिये एक नये अध्याय के रूप में भी देखा जा सकता है। यही संकल्प वैश्विक स्तर पर आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक चिकित्सा के एकीकरण की नींव भी हैं और पारंपरिक चिकित्सा के विस्तार की राह भी। आयुष मंत्रालय भी पहले से ही पारंपरिक चिकित्सा को आधाुनिक चिकित्सा के साथ एकीकृत करने के लिये प्रयास करता आया है। इसके लिये आयुरस्वास्थ्य योजना के तहत सरकारी, गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संगठनों के साथ मिलकर आयुष शिक्षा, औषधि विकास, क्लीनिकल और ट्रांसलेशनल अनुसंधान से जुड़े चुनिंदा संस्थानों के साथ मिलकर उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किये गये है और इनकी संख्या लगातार बढ़ाई जा रही है। अब तक सीओई योजना के तहत कुल 51 परियोजनाओं को मंजूरी दी चुकी है और 31 परियोजनायें सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी हैं। आईसीएमआर के साथ एकीकृत स्वास्थ्य अनुसंधान भी इसी एम्स को शामिल करते हुये इसी क्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। इस पहल के तहत गैस्ट्रो-आंत्र संबंधी विकार, महिला और बाल स्वास्थ्य, वृद्धावस्था स्वास्थ्य, कैंसर देखभाल आदि पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इसके साथ ही आयुष रिसर्च पोर्टल में 43 हजार से अधिक अनुसंधान प्रकाशन भी आयुष मंत्रालय की इस प्रतिबद्धता को दर्शा रहे हैं। एकीकृत स्वास्थ्य की नींव पर जन-स्वास्थ्य को राष्ट्रीय आयुष मिशन के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का लक्ष्य ही है जिसके प्रति आयुष मंत्रालय अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता आया है और जो “दिल्ली घोषणापत्र” के तीसरे संकल्प से भी सामने आता है। पारम्परिक चिकित्सा के दुसरे शिखर सम्मेलन 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2024-2034 को आगे बढ़ाते हुये सदस्य देशों सहित एकीकृत चिकित्सा के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सदस्य देशों, अनुसंधान से जुड़ीं संस्थाओं सहित अन्य हितधारकों से आग्रह किया कि वे एकीकृत चिकित्सा में नये साक्ष्य जुटायें, उसे प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे ले जायें और एकीकरण के लिये सार्थक वित्तीय व्यवस्था करें। पारंपरिक चिकित्सा पर “दिल्ली घोषणापत्र” वैश्विक स्वास्थ्य विमर्श में आए एक गहरे परिवर्तन को भी दर्शाता है। यह घोषणापत्र आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करते हुए इंटीग्रेटिव मेडिसिन के एक ऐसे नए अध्याय की शुरुआत करती है, जिसमें उपचार के साथ-साथ बीमारी को पनपने न देने, संतुलन और समग्र कल्याण को केंद्र में रखा गया है। सुरक्षित, प्रभावी और साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे में शामिल करने की प्रतिबद्धता, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में एक ठोस कदम है। “दिल्ली घोषणापत्र” का यह स्पष्ट संदेश है कि भविष्य की स्वास्थ्य प्रणालियाँ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग पर आधारित होंगीकृजहाँ परंपरा और आधुनिकता मिलकर मानव-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेंगी।

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