बिहार चुनाव के कड़वे अनुभव से सबक सीख कर, चुनावी हालाते का सामना करने के लिये करो या मरो के लिए तैयार होना होगा-बसपा प्रमुख मायावती

एनीटाइम न्यूज नेटवर्क। बिहार विधानसभा आमचुनाव के ठीक पहले सरकारी धन वितरण के बल पर जिस प्रकार से चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है इसपर गंभीर चिन्तन/उपाय जितना जल्द किया जाये लोकतंत्र के हित में यह उतना ही बेहतर होगा। यें बातें पार्टी की आल-इण्डिया बैठक में बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने मुख्यालय में कही। उन्होंने चुनाव तैयारी के साथ-साथ मतगणना के सम्बंध में भी पार्टी के कैडर को सही ट्रेनिंग आदि के जरिये तैयार करने की जरूरत पर भी पार्टी प्रमुख ने बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश सहित देश के 12 प्रदेशों व केन्द्र शासित राज्यों में चल रहे इस अभियान के दौरान लोगों को जो व्यावहारिक दिक्कतें-परेशानियाँ आ रही हैं उसको ध्यान में रखकर देश के बाकी के राज्यों को अपनी तैयारी पहले से ही पूरी कर लेनी चाहिये ताकि खासकर गरीबों, मज़दूरों, शोषितों-पीड़ितों व बहुजन समाज के लोग वोटर बनकर वोट डालने के बहुमूल्य संवैधानिक अधिकार से कहीं वंचित ना रह जाये, क्योंकि वोट की यही ताकत ’बहुजन समाज’ को भारतरत्न परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के संघर्ष के अनुरूप यहाँ ’शोषित से शासक वर्ग’ बना सकती है जो कि अम्बेडकरवादी पार्टी बी.एस.पी. का ’सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति’ का वास्तविक राजनीतिक संघर्ष व संवैधानिक लक्ष्य है।

 

इसके अलावा, देश में व्याप्त महंगाई, गरीबी व बेरोजगारी आदि के फलस्वरूप मजबूरी में पलायन की समस्या के मद्देनजर ग्रामीण रोजगार सम्बन्धी मनरेगा में मूलभूत परिवर्तन सम्बंधी संसद में पेश विधेयक का संज्ञान लेते हुये बी.एस.पी. प्रमुख मायावती ने कहा कि भारत विशाल आबादी वाला देश है जहाँ आमजन के हित, कल्याण व विकास को लेकर हर राज्य के लोगों की अलग-अलग ज़रूरत का होना स्वाभाविक है और इसीलिये यूपी में बी.एस.पी. की सरकार के दौरान हमारी सरकार का यह मत था कि अगर केन्द्र सरकार ऐसी कोई राष्ट्रीय योजना शुरू करना चाहती है तो उसका भार केन्द्र सरकार को ही वहन करना चाहिये, जबकि मनरेगा के स्थान पर नई प्रस्तावित विकसित भारत ग्रामीण रोजगार योजना में केन्द्र सरकार का अंश पहले 90 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है, जिसका प्रभाव राज्य सरकारों पर पड़ेगा तथा राज्यों द्वारा इसका विरोध स्वाभाविक है जिससे आगे चलकर इसको ज़मीनी स्तर पर लागू करके ग़रीब जरूरतमन्दों को सही से लाभ मिलने को प्रभावित करेगा।

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